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हेल्थ एक्सपर्ट्स: भारतीय रोगियों में एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोध काफी तेजी से बढ़ रहा है

October 21, 2019


स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि आमतौर पर उपयोग में लाये जाने वाले एंटीबायोटिक क्लेरिथ्रोमाइसिन का प्रतिरोध करने की क्षमता काफी तेज गति से भारतीय रोगियों में बढ़ रही है|

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, एंटीबायोटिक प्रतिरोध आज वैश्विक स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और विकास के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है।

क्लेरिथ्रोमाइसिन का उपयोग विभिन्न प्रकार के जीवाणु संक्रमणों के इलाज के लिए किया जाता है। इस दवा का उपयोग कुछ प्रकार के पेट के अल्सर के इलाज के लिए एंटी-अल्सर दवाओं के साथ किया जा सकता है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में, एक बड़ी आबादी डॉक्टर की सलाह के बिना ओवर-द-काउंटर (ओटीसी) दवाओं का सेवन करना प्रेफ़र करती है। लंबे समय तक, यह उन्हें अधिकांश एंटीबायोटिक दवाओं सहित क्लेरिथ्रोमाइसिन के लिए प्रतिरोधी बना सकता है|

यूनाइटेड यूरोपियन गैस्ट्रोएंटरोलॉजी (UEG) वीक बार्सिलोना 2019 में प्रस्तुत एक हालिया अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने पाया कि क्लेरिथ्रोमाइसिन जो कि हेलिकोबैक्टर पाइलोरी (H. pylori) को मिटाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सबसे अधिक एस्टैब्लिशड एंटीमाइक्रोबियल में से एक है, उसका प्रतिरोध 1998 में 9.9 प्रतिशत से बढ़कर 21.6 हो गया।वहीं पिछले साल प्रतिशत प्रतिरोध में वृद्धि लिवोफ़्लॉक्सासिन और मेट्रोनिडाजोल के लिए भी देखा गया।

एक अध्ययन में पूरे यूरोप के 18 देशों के 1,232 रोगियों का विश्लेषण किया गया, जिसमे नियमित रूप से हेलिकोबैक्टर पाइलोरी संक्रमण, गैस्ट्रिक अल्सर, लिम्फोमा और गैस्ट्रिक कैंसर से जुड़े एक हानिकारक जीवाणु के लिए एंटीबायोटिक दवाओं के प्रतिरोध की जांच की।

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