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ह्यूमन कोरोना वायरस की खोज करने वाली जून अल्मेडा की कहानी

April 19, 2020

चीन के वुहान शहर से शुरू होकर लगभग पूरी दुनिया में फैल चुका SARS Cov-2 कोरोना वायरस समूह का एक नया वायरस है, जिसके चलते लाखों लोग अपनी जान गवां चुकें हैं|इंसानों में पहली बार कोरोना वायरस की खोज 1965 में स्कॉटलैंड की वायरोलॉजिस्ट जून अल्मेडा ने लंदन के सेंट थॉमस हॉस्पिटल में की थीं|आज उनकी इस रिसर्च से दुनियाभर में फैले कोरोना वायरस को समझने में काफी मदत मिली है|

डॉक्टर अल्मेडा का जन्म 1930 में स्कॉटलैंड के ग्लास्गो में एक बेहद सामान्य परिवार में हुआ था|उनके पिता एक बस ड्राइवर थे|16 साल की उम्र में स्कूल की पढाई छोड़कर अल्मेडा ग्लास्गो रॉयल इनफर्मरी के हिस्टोपैथोलॉजी डिपार्टमेंट में एक लैब टेक्नीशियन के तौर पर काम करने लगीं|बाद में नई संभावनाएं तलाशने के लिए लंदन चलीं गईं और वर्ष 1954 में उन्होंने वेनेजुएला के कलाकार एनरीके अलमेडा से शादी कर ली।

शादी के बाद जून अल्मेडा कनाडा चली गई और वहीं टोरंटो के ओंटेरियो कैंसर इंस्टिट्यूट में एक इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी टेक्नीशियन का काम करते हुए अपने विशेष कौशल को विकसित किया|इस कैंसर इंस्टिट्यूट में काम करके उन्होंने ऐसी विधि में महारत हासिल कर ली थी जिसकी मदत से वायरस की कल्पना करना बेहद आसान हो गया था|

बीबीसी की खबर के मुताबिक UK(यूनाइटेड किंगडम) ने उनके काम के अहमियत को समझते हुए 1964 में उनके सामने लंदन के सेंट थॉमस मेडिकल स्कूल में काम करने का प्रस्ताव रखा|

कनाडा से लौटने के बाद डॉक्टर अल्मेडा ने डॉक्टर डेविड टायरेल के साथ रिसर्च का काम शुरू किया जो उन दिनों यूके के सेलिस्बरी क्षेत्र में सामान्य सर्दी-जुकाम पर शोध कर रहे थे।

डॉक्टर डेविड टायरेल ने अपने ही रिसर्च के दौरान नाक से निकलने वाले तरल पदार्थ के कई सैंपल एकत्र किये हुए थे|उनकी टीम को लगभग सभी सैम्पल्स में सामान्य सर्दी-जुकाम के दौरान पाए जाने वाले वायरस दिख रहे थे, लेकिन इनमें एक सैंपल सबसे अलग था जिसे बी-814 नाम दिया गया था|

उन्हें यह लगा की क्यों ना इस सैंपल का टेस्ट डॉ अल्मेडा के इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से किया जाय| टेस्ट के लिए सैंपल को डॉक्टर अलमेडा के पास भेजा गया, उन्होंने बताया कि यह वायरस
सामान्य सर्दी-जुकाम के दौरान पाए जाने वाले वायरस की तरह तो दिख रहे हैं पर वो हैं नहीं बल्कि इससे अलग हैं|दरअसल यही वह वायरस है जिसकी पहचान डॉ. जून अल्मेडा ने कोरोना वायरस के तौर पे की|

अल्मेडा ने जब वायरस और एंटीबॉडी के इस कॉम्प्लेक्स की स्टडी की, तो उन्हें समझ आया कि ये वायरस आकार में एवियन ब्रोंकाइटिस और चूहों में होने वाले हेपेटाइटिस के लिए जिम्मेदार वायरस जैसे हैं|

बीबीसी के मुताबिक जून का पहला रिसर्च पेपर यह कहकर रिजेक्ट कर दिया गया था कि उन्होने इन्फ़्लुएन्ज़ा वायरस की ही ख़राब तस्वीरें प्रस्तुत की है|हालाकिं सैंपल संख्या बी-814 से हुए नए खोज को 1965 में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित किया गया और उसके दो वर्ष बाद जर्नल ऑफ जेनेरल वायरोलॉजी में तस्वीर के साथ प्रकाशित किया गया।

डॉक्टर टायरेल, डॉक्टर अल्मेडा और सेंट थॉमस मेडिकल संस्थान के प्रोफेसर टोनी वॉटरसन ने इस वायरस की ऊंची-नीची बनावट को देखते हुए ही इस वायरस का नाम कोरोना वायरस रखा था।

बाद में जून ने लंदन के पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल कॉलेज में काम किया और वहीं से उन्होंने अपनी पीएचडी कम्पलीट की|

अपने करियर के अंतिम दिनों में डॉ अल्मेडा वेलकॉम इंस्टिट्यूट में थीं जहाँ उन्होंने इमेजिंग के जरिये कई वायरस की पहचान की और उनका पेटेंट अपने नाम कराया| वहीं अस्सी के दशक में संरक्षक के तौर पे HIV वायरस की नॉवेल तस्वीरें लेने के लिए उन्हें बुलाया गया|

वर्ष 2007 में 77 वर्ष की आयु में डॉ. जून अल्मेडा ने दुनिया को अलविदा कह दिया|

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