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मणिपुर के काले चावल और गोरखपुर टेराकोटा को मिला GI टैग

May 1, 2020

मणिपुर के काला चावल (Black Rice) जिसे Chak-Hao भी कहा जाता है, गोरखपुर के टेराकोटा (Terracotta) और कोविलपट्टी के कदलाई मित्तई (Kadalai Mittai) को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन टैग(GI tag) दिया गया|

जियोग्रॉफिल इंडीकेशन टैग (जीआई टैग) से किसी क्षेत्र विशेष के उत्पादों को खास पहचान मिलती है|और उसकी भौगोलिक स्थिति के नाम पर ही पूरी दुनिया में उत्पाद बिकता है।

काला चावल (Chak-Hao)

मणिपुर में उगाये जाने वाले इस काले चावल को उसके पोषक गुणों के कारण जाना जाता है|अन्य चावल की किस्मों जैसे भूरे चावल आदि की तुलना में इसका वजन अधिक होता है। इसमें पाए जाने वाले एंथोसायनिन एजेंट के कारण यह काले रंग का और वजनीय होता है। एंथोसायनिन एजेंट एक एंटी-ऑक्सीडेंट एजेंट है इससे ये बॉडी को डि‍टॉक्स करते हैं जिससे कई तरह की बीमारियां और सेहत संबंधी परेशानि‍यां दूर रहती हैं|दिल से जुड़ी बीमारी के लिए भी काले चावल बेहतर होते हैं|
काले चावल में किसी भी दूसरे चावल की तुलना में सबसे अधिक प्रोटीन पाया जाता है| इसके अलावा ये फाइबर के मामले में भी सबसे आगे है और इसमें आयरन भी पाया जाता है|

इस चावल का उपयोग खासतौर पर मिष्ठान और दलिया बनाने में किया जाता है। यह चीन की पारंपरिक रोटी, नूडल्स और चावल केक व्यंजनों में उपयोग किया जाता है।

गोरखपुर के टेराकोटा (Terracotta)

गोरखपुर शहर से महज 15 किलो मीटर दूर औरंगाबाद अपने टेराकोटा हस्तशिल्प के लिए भारत मे ही नहीं विदेशों मे भी जाना जाता है। गोरखपुर का टेराकोटा सदियों पुराना है। शहर के कुम्हार मिट्टी से हाथी, घोड़े जैसे जानवरों की आकृतियाँ बनाते हैं। गोरखपुर की इस मिट्टी की हस्तकला की खासियत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी समेत कई नेता इन गांवों का दौरा कर चुके हैं।

Kovilpatti Kadalai Mittai

कदलाई मित्तई Kadalai Mittai(चिक्की) एक प्रकार का कैंडी है जिसे तमिलनाडु के दक्षिणी हिस्से में बनाया जाता है|कैंडी का उत्पादन विशिष्ट स्थानों से प्राप्त मूंगफली और गुड़ से किया जाता है। इसे बनाने में थामीबरानी नदी के पानी का विशेष रूप से उपयोग किया जाता है। क्षेत्र के उत्पादकों के अनुसार इस विशेष नदी का पानी कैंडी के स्वाद को और बढ़ा देता है।

1940 के दशक में, कस्बे में एक किराने की दुकान के मालिक पोन्नम्बाला नादर ने गन्ने का गुड़ और मूंगफली का उपयोग कदलाई मट्टई बनाने का फैसला किया था।

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