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21 मई को पहली बार मनाया गया अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस,जाने भारत में कैसे पहुंचा चाय

May 21, 2020

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इस साल से अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस 21 मई को प्रतिवर्ष मनाया जाएगा।21 मई, 2020 यानी कि आज पुरे विश्व ने अपना पहला चाय दिवस मनाया।अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस मनाने का संकल्प 2019 में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन द्वारा लिया गया था।

वैसे तो अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस 2005 से दुनिया के प्रमुख चाय उत्पादक देशों जैसे श्रीलंका, भारत, इंडोनेशिया, वियतनाम, बांग्लादेश, नेपाल, केन्या, मलेशिया, मलावी, युगांडा और तंजानिया में मनाया जा रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस का उद्देश्य लंबे इतिहास और दुनिया भर में चाय के गहरे सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना है।

यूएन कहना है कि चाय का औषधीय महत्व है और इसके एंटीइंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सिडेंट गुणों के कारण चाय के कई स्वास्थ्य लाभ हैं।

चाय दुनिया में पानी के बाद सबसे अधिक पिए जाने वाला पेय पदार्थ है|आपको बता दें कि दुनिया में रोज़ तकरीबन दो अरब लोग अपने दिन की शुरुआत चाय के गर्म प्याले से करते हैं|

आज दुनियाभर में सप्लाई की गई कुल चाय का लगभग 60 फीसदी चाय चीन और भारत से आता है| दुनिया में चाय के उत्पादन चीन सबसे ऊपर हैं उसके बाद भारत और फिर केन्या का नंबर आता है|

भारत दुनिया में चाय का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। भारत लगभग 30% वैश्विक चाय उत्पादन का उपभोग करता है। लेकिन प्रति व्यक्ति ख़पत की बात करें तो तुर्की सबसे आगे है वैसे आयरलैंड और यूनाइटेड किंगडम में भी चाय की प्रति व्यक्ति खपत अन्य देशों से काफी अधिक है|

चाय का इतिहास

चीन में चाय हजारों साल से पिया जा रहा है|शांग राजवंश के दौरान दक्षिण पश्चिम चीन में चाय की उत्पत्ति हुई, जहां इसका उपयोग औषधीय पेय के रूप में किया जाता था|वैसे चाय की उत्पत्ति को लेकर कई कहानिया हैं उनमे से एक कहानी है कि किसी एक जंगल में चीनी बादशाह शिनूंग का पानी उबल रहा था कि चंद पत्तियां हवा से उड़कर बर्तन में जा गिरीं|शिनूंग ने जब ये पानी पिया तो न सिर्फ़ उसे स्वाद पसंद आया बल्कि उसे पीने से उसके बदन में चुस्ती भी आ गई|उसके बाद से उन्होंने पुरे राज्य में लोगों से इसे इस्तमाल करने को आदेश दिया|

चीन से यूरोप और यूरोप से भारत तक चाय पहुंचने की कहानी

यूरोप में चाय की शुरुआत को लेकर बात करें तो वहां सबसे पहले 16वीं सदी में चाय के बारे में पता चला जब पुर्तगालियों ने इसकी पत्ती का व्यापार शुरू किया| एक सदी के अंदर-अंदर चाय दुनिया के विभिन्न इलाक़ों में पी जाने लगी| लेकिन ख़ासतौर पर ये अंग्रेज़ों को उतनी पंसद आई कि घर-घर पी जाने लगी|

ईस्ट इंडिया कंपनी चीन से चाय खरीदकर यूरोप भेजती थी लेकिन चीन से उसे महंगे दामों में चाय खरीदना पड़ता था और साथी ही लम्बी दूरी के चलते उसका ट्रांसपोटेशन चार्ज भी बढ़ जाता है| इन सब के चलते यूरोप में चाय महंगी पड़ती थी|इस वजह से अंग्रेज़ चाहते थे कि वह ख़ुद हिंदुस्तान में इसे उगाएं|

एक वक़्त के लिए केवल चीन को ही पता था कि चाय के पौधे कैसे उगाये जाते हैं और उससे चाय कैसे प्राप्त करते हैं|यही कारण था कि कंपनी ने रॉबर्ट फॉर्च्यून को इस पर जासूसी के लिए चीन भेजा|और यह आदेश दिया था कि वह बेहतरीन चाय के पौधे और बीज के अलावा ऐसे पौधों की खेती और उगाने की तकनीक हासिल करके आए जिसे हिंदुस्तान में पैदा किया जा सके|

रॉबर्ट फॉर्च्यून चाय के पौधों और बीज को हिंदुस्तान लाने में सफल रहे और ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनकी निगरानी में असम के इलाक़े में चाय के पौधे उगाने शुरू किए|लेकिन उन्होंने इस मामले में एक ग़लती की. वह जो पौधे चीन से लेकर आए थे वह वहां पहाड़ के ठंडे मौसम के आदी थे| असम के गर्म इलाक़े उन्हें रास नहीं आए और वह धीरे-धीरे सूखने लगे|

लेकिन नियती ने अंग्रेजों के लिए कुछ और अच्छा सोच रखा था, उसी दौरान असम में उगने वाले एक पौधे का मामला सामने आया| जो कि चीन में उगाये जाने वाले चाय के पौधे का ही एक नश्ल था|इस पौधे को एक स्कॉटिश व्यक्ति रॉबर्ट ब्रॉस ने 1823 में खोजा था| चाय से मिलता-जुलता यह पौधा असम के पहाड़ी इलाक़ों में जंगली झाड़ियों की तरह उगता था|आखिरकार कंपनी ने अपना ध्यान इस पौधे पर लगा दिया| वैसे तो चीनी हजारों साल से खौलते पानी चाय की पत्ती डालकर पीते थे लेकिन अंग्रेजों ने इसे और स्वादिस्ट करने के लिए इसमें दूध और चीनी मिलाने लगे|और यही बात भारतियों ने अंग्रेजों से अपना ली|

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