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40 वर्षों तक एक मुस्लिम परिवार मानसिक रूप से कमज़ोर अनजान हिन्दू महिला का बना रहा सहारा

June 25, 2020

इंसानियत ने 40 वर्षो तक, एक अनजान, मानसिक रूप से कमज़ोर हिन्दू महिला को मुसलमान परिवार में पनाह दी वहीं टेक्नोलॉजी ने उन्हें एक लम्बे अरसे के बाद अपनों से मिलाया| इंसानियत और टेक्नोलॉजी के इस मेल ने एक महिला को 40 साल बाद उसके घर वालों से मिलाया|

हम बात कर रहे हैं चालीस साल पहले गुमशुदा हुईं नागपुर की पंचूबाई की जिन्हें दमोह अच्छन मौसी कहता है| 40 साल पहले वे अपने परिवार से बिछड़ गई थीं उन्हें नूर ख़ान नाम के ट्रक ड्राइवर ने बेहोश अवस्था में पाया था जिनपर मधुमक्खियों ने हमला किया हुआ था और वे उन्हें किसी तरह अपने घर लेकर आये और तब से वे उस परिवार का हिस्सा बन गईं|

बीबीसी के खबर के मुताबिक नूर ख़ान के बेटे इसरार ने कहा कि इन बीते क़रीब 40 वर्षों में नूर ख़ान ने, पंचूबाई के परिवार को खोजने का प्रयास किया| लेकिन बुज़ुर्ग महिला मानसिक बीमारी और सिर्फ़ मराठी बोल पाने की वजह से अपने घर का पता ठीक से बता नहीं पाती थीं|

साथ ही यह भी कहा कि अपने ड्राइवरी के दौरान जब भी नूर ख़ान महाराष्ट्र जाते तो वो ज़रूर अच्छन मौसी को उनके परिवार से मिलाने की कोशिश करते थे|

इसरार ने बताया, “अब्बा के गुजरने के बाद हमने कई बार फ़ेसबुक, सोशल मीडिया में उनके वीडियो, फ़ोटो अपलोड कर, मौसी के घरवालों तक पहुंचने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली.”

इसरार बताते हैं कि एक दिन अचानक मौसी ने एक नाम बुदबुदाया वह था परसापुर मैंने इस नाम को गूगल पर सर्च किया तो पाया कि यह गाँव महाराष्ट्र के अमरावती जिले में स्थित है”.

फ़ोन की मदद से इसरार परसापुर के कनिष्का ऑनलाइन संस्था के अभिषेक तक जा पहुंचे और अच्छन मौसी के बारे में बताया|

दोनों के बीच तय हुआ कि इसरार अच्छन मौसी का एक वीडियो बनाएगा और वो वीडियो अभिषेक सोशल मीडिया के ज़रिये परसापुर के मोबाइल यूजर्स तक पहुंचाने की कोशिश करेगा|

जैसे ही अभिषेक को वीडियो और तस्वीरें मिली उसने वहां के आसपास बसे कस्बों, समाज और सांस्कृतिक मंडलों के बने मोबाइल यूजर्स ग्रुप में इन्हें पहुंचाया| लगभग दो घंटे के भीतर अभिषेक के साथ-साथ लगभग आधे परसापुर को पता चल गया था कि इस वृद्ध महिला का ननिहाल अंजमनगर में है|

कुछ दिनों के भीतर ही नागपुर से पृथ्वी भैयालाल शिंगणे ने इसरार को फ़ोन किया और कहा कि वीडियो और तस्वीरों वाली महिला उनकी दादी है|

पृथ्वी भैयालाल शिंगणे और उनका परिवार 17 जून दोपहर को 40 साल के लम्बे वक़्त के बाद अपनी दादी को लेने के लिए कोटातला गांव जा पहुंचा|पूरा गाँव अपनी अच्छन मौसी के विदाई के लिए उमड़ा हुआ था|

इसरार अपनी अच्छन मौसी को उनके परिवार से मिलाकर बेहद ख़ुश हैं|बस एक मलाल है कि होश संभालने के बाद जिस अच्छन मौसी को हर वक़्त अपने नजरों के सामने पाया करते थे अब उनके बिना 30 जून को उन्हें अपना 40 वाँ जन्मदिन मनाना पड़ेगा|

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