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एरोस्पेस इंजीनियरिंग में भरें करियर की उड़ान

May 19, 2019

एयरोस्पेस इंजीनियरिंग अपने में ही लोगों को उत्साहित करने वाला और चुनौतीपूर्ण क्षेत्र है| इसके तहत नागरिक उड्डयन, स्पेस रिसर्च, डिफेंस टेक्नोलॉजी आदि के क्षेत्र में नई तकनीकों के विकास को लेकर काम किया जाता है। इस क्षेत्र में छात्रों को एयरक्राफ्ट और स्पेस क्राफ्ट के डिजाईन, डेवेलपमेंट, मेंटेनेंस से लेकर परीक्षण के बारे में पढ़ाया जाता है| ऐरोस्पेस इंजीनियरिंग को दो भागों में बाटा जा सकता है- एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग और एस्ट्रोनॉटिकल इंजीनियरिंग

एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में एयरक्राफ्ट के डिजाईन, मैन्युफैक्चरिंग और मेंटेनेंस के बारे में पढ़ाया जाता है| एस्ट्रोनॉटिकल इंजीनियरिंग एयरोस्पेस इंजीनियरिंग का एक विशेष क्षेत्र है जिसमे पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर संचालित वाहनों और उपकरणों के डिजाइन, विकास और परीक्षण के कार्यों को अंजाम दिया जाता है।

एयरोनॉटिकल और एयरोस्पेस इंजीनियर में मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स,इलेक्ट्रिकल और मटेरियल इंजीनियरिंग के कौशल का समावेश होता है।

एयरोस्पेस इंजीनियरिंग मूलतः इन विषयों में ऑफर की जाती है- एयरोस्पेस इंजीनियर,एयरोस्पेस स्ट्रक्चरल इंजीनियर,एरोनॉटिकल इंजीनियर और एयरोस्पेस डिफेन्स इंजीनियरिंग|

एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग:

एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग के तहत संरचनात्मक अभिकल्पन, नेविगेशनल गाइडेंस एंड कंट्रोल सिस्टम, इंस्ट्रूमेंटेशन एवं कम्यूनिकेशन अथवा प्रोडक्शन मैथड के साथ ही साथ वायुसेना के विमान, यात्री विमान, हेलीकॉप्टर से जुड़े कार्य शामिल हैं।

एविएशन इंडस्ट्री की बात करें तो टेक्निकल विभाग में एयरोनॉटिकल इंजीनियर की महत्वपूर्ण भूमिका होती है| उनका काम विमान में लगे सभी इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों की हर एंगल से जाच करना है|विमान बनाने वाली कंपनियों में विमान के डिजाईन से लेकर निर्माण का कार्य एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग के अंतर्गत होता है| बीते दस वर्षों में देश की एविएशन इंडस्ट्री सालाना 14 फीसदी की दर से बढ़ी है। फिलहाल भारत दुनिया का नौवां सबसे बड़ा एविएशन मार्केट है और 2020 तक इसे तीसरे स्थान पर पहुंच जाने की संभावना है।और कई एयर लाइन्स कंपनियों ने मार्केट में आना शुरू कर दिया है| जॉब की बात करें तो राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर कई पब्लिक और प्राइवेट इंडस्ट्रीज है जहां से आप अपने करियर की शरुआत कर सकतें हैं|

इस क्षेत्र में काम के लिहाज से अलग–अलग जॉब प्रोफाइल है, जैसे कि एयरोस्पेस डिजाईन चेकर, एयरक्राफ्ट इंजिनियर, एयरक्राफ्ट प्रोडक्शन मैनेजर और थर्मल डिजाईन इंजिनियर

इस क्षेत्र करियर शुरू करने के लिए छात्रों को एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में बीई तथा बीटेक की ग्रेजुएट डिग्री अलावा कम से कम एयरोनॉटिक्स में तीन वर्षीय डिप्लोमा करना अनिवार्य होता है| एएमई (एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियरिंग) एक अच्छा प्रशिक्षण पाठ्यक्रम है जिससे छात्र को डिप्लोमा की डिग्री ऑफर होती है। इसके पूरा होने के बाद छात्र को किसी भी एयरलाइन्स कंपनी में काम करने के लिए  डीजीसीए से लाइसेंस प्राप्त करना आवश्यक होता है जिसके लिए छात्र को एक परीक्षा से होकर गुजरना होता है|

इन कोर्सेज में एडमिशन के लिए छात्रों को 12वीं में भौतिकी एवं गणित के साथ उत्तीर्ण होना अनिवार्य होता है।

अधिकतर बड़े और प्रतिष्ठित कॉलेजों ही एयरोनॉटिकल में डिग्री ऑफर करतें हैं| वे इस प्रकार हैं-

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी,चेन्नई

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी,मुंबई

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, कानपुर

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी,खड़गपुर

पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज,चंडीगढ़

मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस (आईआईएस), बैंगलोर

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी

हिंदुस्तान यूनिवर्सिटी

एस्ट्रोनॉटिकल इंजीनियरिंग

एस्ट्रोनॉटिकल इंजीनियरिंग में छात्रों को स्पेस क्राफ्ट और स्पेस स्टेशन के डिजाईन, मैन्युफैक्चरिंग और मेंटेनेंस के बारे में पढ़ाया जाता है|

एक एस्ट्रोनॉटिकल इंजीनियर बनने के लिए, आपको एयरोस्पेस इंजीनियरिंग पर ध्यान देने के साथ आम तौर पर एयरोनॉटिकल या एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की डिग्री या मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री की आवश्यकता होती है।

टॉप रेक्रुइटर:

Pawan Hans Ltd

Helicopter Corporation of India

(HAL)

DRDO

ISRO

NASA

National aerospace labroratries

Air India

Airbus

Jet Airways

भारत की सबसे पुरानी मॉडर्न यूनिवर्सिटी कलकत्ता यूनिवर्सिटी
भारत की सबसे पुरानी आधुनिक यूनिवर्सिटी कलकत्ता यूनिवर्सिटी

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